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हमारे अन्नदाता पाई पाई और दाने – दाने का मोहताज़ है .......

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हमारे अन्नदाता पाई पाई और दाने – दाने का मोहताज़ है | किसी के पास जमीं नहीं है तो किसी के सर पर छत नहीं मयस्सर है | महिलाये आज भी दोयम जिंदगी जीने को अभिशप्त है | कुल मिलकर ग्रामीण भारत की तस्वीर बहुत भयावह है | ऐसे में सवाल यह उठता है की आखिर इस स्तिथि की वजह क्या रहि ? क्या शहरों के गांवो के बिच की खाई इस दौरान निर्बाध रूप से चौड़ी होती गई ? क्या हमारी नीतिया, योजनाये और राजनितिक इच्छा शक्ति किसान और खेती का भला नहीं कर पाए जिसके वे हकदार थे |        24.39 करोड़  – देश के कुल परिवारों के संख्या 17.91 करोड़ – गांवो में रहने वाले परिवारों की संख्या   नीतियों का झुकाव - किसी भी अर्थव्यवस्था में ग्रामीण और शहरी क्षेत्र आर्थिक , वित्तीय  और सामाजिक रूप से आपस में गुंथे होते है | आदर्श स्तिथि तो यह होती है कि संसाधनों और सेवाओ का दोनों क्षेत्रो में संतुलन स्थापित होना चाहिए | दुर्भाग्य से भारत और चीन जैसे विकासशील देशो में यह विडंबना दिखती है | इन देशो में तेज़ गति से उद्योगीकरण में अपने ग्रामीण क्षेत्र के अतिरिक्त श्रम और संस...

अब तो छोडो फ़ास्ट फूड्स .....|| क्या वास्तव में हम अपनी जीवन शैली को लेकर जागरूक है ||

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यह कहना गलत नहीं होगा की हमारा भोजन और जीवन शैली का सीधा असर हमारी मानसिक स्तिथि और स्वस्थ पर पड़ता है | मधुमेह , कोलेस्ट्राल और उच्च रक्तचाप जैसी बीमारियों के मामले पहले जहा लगभग 40 वर्ष की उम्र के बाद सामने आते है | वाही आज 25 से 30 वर्ष की उम्र वाले लोग इन बीमारियों से ग्रस्त हो रहे है | यह बात हमे सोचने पर मजबूर करती है  कि क्या वास्तव में हम अपनी जीवन शैली को लेकर जागरूक हो रहे है| खानपान में  बदलाव  - देश पिछले कुछ दशको में लोगो की खानपान की प्रवृतियो  में काफी बदलाव आया है | भारतीयों  की खानपान की आदतों पर कुछ हद तक धार्मिक मान्यताओ का प्रभाव था , परन्तु अब आहार धीरे-धीरे सुविधा  पर आधारित होता जा रहा है | सुविधाजनक भोजन जहां बनाने में  आसान और स्वादिस्ट होता है| वही अब यह एक फैशन भी बनता जा रहा है | समय की कमी और मानसिक तनाव सबसे आम बहाना है  इन सुविधाजनक खाद्य पदार्थो के सेवन करने का | आजकल चिप्स , कोल्ड ड्रिंक्स , बिस्किट्स , पिज़्ज़ा , बर्गर , नुडल्स , चौमिंग और समोसा बहुत कम उम्र से ही लोगो के रोजमर्रा के आहार का हिस्सा बन ...

आ अब लौट चले || जब स्मृति में कौंधता है अपना गाँव , अपने लोग ..||

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सब कुछ मिला है शहर में | अच्छी शिक्षा , अच्छा खाना , अच्छा पहनावा और बेहतर जिंदगी , पर साथ ही है कुछ छुट जाने की कसक भी | अपनी मिटटी , अपनी जुडो से दूर होने की यह कसक और टीसती है , जब स्मृति में कौंधता है अपना गाँव , अपने लोग ........... बारिश में भर जाते है नहर , पोखर, तालाब | इनमे एक साथ नहाते हुए बच्चे , बकरिया और भैस ,धुल में सने पैर लिए चौराहे या बैलगाड़ी पर सुस्ताते ग्रामीण ........ खेतो में उपलों पर थापी रोटी के साथ प्याज खाते लोग .... एक भीनी सी खुशबु  फैली होती है चारो ओर ......| गाँव को याद करके सहसा ऐसी तस्वीरे जेहन में तैरने लगती है |एक जैसी सुबह  , एक तरह की शाम और एक रस होती  जा रही शहरी जिंदगी में नवरंग भरती  है ये तस्वीरे | ऊची -ऊची इमारतो , फ्लेट्स और शहर में बने आलिशान मकानों में वैसे जुड़ नहीं पाते हम , जैसा जुडाव होता है सालो से खड़े अपनी मिटटी , अपनी जमीं पर बने टूटे , जर्जर हो चुके दो कमरों वाले घर से |

पर्यावरण असंतुलन और बीमारिया...

1 - मनुष्य में बढते रोग , असमय बुढ़ापा व मृत्यु का मुख्य कारन  पर्यावरण असंतुलन है | 2 - अधिकाधिक पोधारोपन के माध्यम से  पर्यावरण  को संतुलित कर इससे बचा जा सकता है | 3 - पर्यावरण संतुलन व सुरक्षित जीवन के लिए ३३ फीसद जंगल का होना आवश्यक है | 4 - पर्यावरण संतुलित रहने से ही मानव का शरीरिक ,  मानसिक व  आध्यात्मिक संतुलन बरकरार रहेगा | 5 - आज कल केदारनाथ और बद्रीनाथ में दरकते हुवे पहाड़ इस बात का संकेत है कि पर्यावरणीय विनाश की सीमा अब खतरे के निशान को भी पार करने लगी है ||